बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

"सतनामीयों का गौरवशाली इतिहास"

"सतनामीयों का गौरवशाली इतिहास"

 

    अध्यात्म गुरू अमरदास जी से प्राप्त आशिर्वाद तथा राजा गुरू बालकदास जी द्वारा राजमहंत पद पर प्रथम नियुक्त भुजबलजी ने अपने सुपुत्र दयाली उर्फ दयालदास की शादी में पालकी का उपयोग किये l जगतगुरू अगमदास जी, राजमहंत नैनदास महिलांग, राजमहंत अंजोरदास, महंत विशालदास, महंत फूलदास एवं रतिराम मालगुजार आदि लोगो ने गौवध के विरोध में सन् 1914 . से 1924 . तक बड़ा ही सशक्त आंदोलन छत्तीसगढ़ में चलाये। सामाजिक एकता के बल पर बलौदाबाजार के करमनडीह तथा ढाबाडीह के बूचड़खानो को तोड़ डाले तथा कसाईखाना बंद करा दिये

        27
जनवरी 1926 को सतनामी महासभा, छत्तीसगढ़ क्षेत्र के अध्यक्ष माननीय श्री रतिराम मालगुजार, सचिव श्री अंजोर दास जी एवं राजमहंत नयनदास महिलांग जी ने जगतगुरू अगमदास जी के अगुवाई में एक संयुक्त ज्ञापन मध्यप्रदेश एवं बरार के राज्यपाल सर माण्टग्यू बटलर को बिलासपुर में सौंपी जिसमें सतनामी समाज के तत्कालीन समस्यायें और मांगे अंग्रेज सरकार के समक्ष रखी गयी प्रमुख मांगे

. सतनामीयों को सिर्फ सतनामी ही कहा जाय l
. सतनामीयों को दुसरो के अत्याचारो से मुक्ति एवं काम के बदले मजदुरी दिलाने l. कानूनी संरक्षण देने l. बच्चो को स्कूल में भेदभाव रहित शिक्षा l
. किसानो को बेगारी से मुक्ति दिलाने तथा राजनिती में प्रतिनिधित्व देने के संबंध में थी

    अंग्रेज सरकार ने सभी मांगों को स्वीकार करते हुये दिनांक 7 अक्टूबर 1926 को एक आदेश जारी किये जिसमें सतनामी काे सिर्फ सतनामी कहा गया और यह भी कहा गया कि कानून आप लोगो को वैसा ही कानूनी संरक्षण प्रदान करेगी जैसा कि अन्य सभी समुदाय के लोगो को प्रदत्त है सरकार मध्य प्रांत के विधानसभा में पिछड़े वर्ग के मनोनीत सदस्यो की संख्या में बढ़ोतरी कर तत्काल 2 से 4 करने की स्वीकृति प्रदान कर चुकी है। स्थानीय संस्थानो में 10 अगस्त 1921 को पास हुआ है और सरकार ने स्वीकृति दी है तदनुसार कुछ जिलो में नियुक्ती भी निश्चित रुप से की जा चुकी है जैसे रायपुर और दुर्ग अब यह भी निश्चित किया गया है कि जहाँ सतनामीयों की आबादी अधिक होगी वहाँ उन्हे ही प्रतिनिधित्व देने पर विचार होगा शासकिय विभागो में पूर्ण स्वतंत्रतापूर्वक सतनामीयों को सेवा प्राप्त करने या नौकरी हेतु सरकार का कोई भी विभाग बंद नही है सतनामी लोग अपनी इच्छानुसार योग्यतानुसार सरकारी विभागो में नौकरी प्राप्त कर सकता है वर्तमान लोकतंत्रात्मक गणराज्य में सतनामीयों की इच्छा का आदर किया जायेगा तथा उन्हे प्रताड़ित नही किया जायेगा सन् 1930 के स्वाधीनता संग्राम में मुंगेली तहसील के सतनामीयों ने विदेशी शराब तथा विदेशी कपड़ो के बहिष्कार के लिये उन दुकानो पर धरना प्रदर्शन किया। इतना ही नही सतनामी समाज के लोगो ने राष्ट्रीय धारा से जुड़ते हुये सन 1923, सन 1930, सन 1932 एवं सन 1941-42 के स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेकर सतनामी एकता का परिचय दिये

    भारत स्वतंत्र होने के पश्चात सतनामी जाति को अनुसूचित जाति में घोषित कर दिये। सन 1950 में आरक्षण विधेयक पर हस्ताक्षर करके गुर वंशज जगतगुरू अगमदास जी ने सतनामी समाज के लोगो को आरक्षण सुविधा पाने का अधिकार दिलाया तथा समाजोत्थान के लिये साहित्य के महत्व को स्वीकार करके अपने स्वयं के खर्च पर छोटी-छोटी पुस्तको का प्रकाशन कर लोगों को बांटा

    जगतगुरू अगमदास जी के धर्म पत्नि गुरू माता मिनीमाता जी ने छत्तीसगढ़ को अकाल से मुक्त कराने के लिये हसदो महानदी परियोजना प्रारंभ करवाया तथा 17 अप्रैल को लोकसभा में अस्पृश्यता निवारण बिल अशासकीय संकल्प प्रस्तुत किया जो 1 जून 1955 से लागू हुआ।

        19
जनवरी सन 1967 को मुंगेली क्षेत्र के ग्राम बैगाकांपा गुरवइनडबरी में पांच बेगुनाह सतनामीयों की हत्या सवर्णो द्वारा किये जाने पर गुरू माता मिनीमाता ने अपने दहाड़ से संसद को हिलाकर रख दिया तथा घटना स्थल पर जाकर सतनामी एकता का प्रदर्शन किया और स्थिति को सामान्य बनाया

    सन 1981-82 में सवर्णो ने ग्राम केसतरा के सतनामी को जिंदा जलाकर उनकी हत्या कर दी गई तब सतनामी समाज के लोगो ने अपनी एकता के बल पर हत्यारो को अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा दिलाये

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अप्रैल 1986 कोसतनामी समाज के लोगो ने गुरू वंशज आसकरण दास जी के अगुवाई में तेलासी बाड़ा मुक्ति के लिये आंदोलन किये तथा सन 1986 को सरकार को अपनी एकता के बल पर तेलासीबाडा को शासन द्वारा अधिग्रहण कर उसे सतनामी समाज को सौंपने हेतु मनवाया

    सतनामी समाज में कई ऐसी विभूतियाँ हुई हैं जिनके कार्य एवं दर्शन को सराहा गया उनके सामाजिक विश्लेषण दार्शनक विचार ने लोगो को प्रभावित किया। उन्होने सामाजिक परिवर्तन की दिशा दिखाई, समाज निर्माण के लिये सामाजिक चेतना जागृत किये। आज सतनामी समाज इन महापुरूषो द्वारा समाज के निर्माण संबंधी किये गये अमुल्य कार्यो के लिये नतमस्तक हैं ।हमारे महापुरूष लोग चाहते थे कि समाज के लोग अपने अधिकार को जाने तथा उनके प्रति जागरुक हो और स्वयं अपने आप में एकता रुपी शक्ति पैदा करें ताकि वे अपने उत्थान के लिये संघर्ष करके अपने अधिकारो को प्राप्त कर सके

    आज सतनामी समाज में एकता की भावना क्रमशः तिरोहित होती जा रही है। तरह तरह के स्वार्थो अहम ने तथा भौतिकवाद के एकांगी विकाश ने एेसा प्रभाव जमाया है कि सतनामी जनमानस एकता से अनेकता में बंटती जा रही है, शिक्षा के प्रसार, विज्ञान टेक्नाँलाजी के विस्तार के बावजूद सामाजिक विषमता फैलती जा रही है जिससे लोगो में आपसी प्रतिशोध की भावना जागृत होते जा रही है। पद प्रतिष्ठा एवं स्वार्थ की प्रवृति दैनिक दिनचर्या का अंग बनती जा रही है ऐसी भयंकर परिस्थियों में समाज को किसी बाहरी शत्रु से नही बल्कि फूटग्रस्त अपने लोगो से ही खतरा उत्पन्न हो गया है जो एकता और अखंडता का स्वरूप और महत्व को जानते समझते नही हैं अर्थात हम सामाजिक दृष्टि से छिन्न भिन्न और अस्त ब्यस्त होते जा रहे हैं। यह हमारे लिये हर दृष्टि से शर्म की बात है। अच्छा हो हम समय रहते अपनी भूल को सुधारें और समाज की एकता, अखंडता एवं समता के सार्वभौम न्याय सिद्धांत को स्वीकारें। आपसी द्वेष भावनाओ का जितना शिघ्र उन्मूलन होगा उतना ही सीघ्र स्वयं एवं समाज कल्याण होगा अन्यथा हमें अपनी स्वार्थ पन के करतूतो का दण्ड कराह-कराह कर भुगतना पड़ेगा

लेख- श्री विष्णु बन्जारे सतनामी

 

सतनामी एवं सतनाम धर्म द्वारा जनहित में प्रचारित

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