मंगलवार, 11 नवंबर 2014

कोढी का उदधार

कोढी का उदधार

एक बार परम पूज्य गुरु घासीदास जी जगत का उद्धार करते हुए एक गाँव के बाहर पहुँचे और देखा वहाँ एक झोपड़ी बनी हुई थी। उस झोपड़े में एक आदमी रहता था, जिसे कुष्‍ठ का रोग था। गाँव के सारे लोग उससे नफरत करते थे कोई उसके पास नहीं आता था। कभी किसी को दया आ
जाती तो उसे खाने के लिए कुछ दे देते।
गुरुजी उस कोढ़ी के पास गए और कहा- भाई हम आज रात तेरी झोपड़ी में रहना चाहते है अगर तुझे कोई परेशानी ना हो तो। कोढ़ी हैरान हो गया क्योंकि उसके तो पास में कोई आना नहीं चाहता था। फिर उसके घर में रहने के लिए कोई राजी कैसे हो गया?
कोढ़ी अपने रोग से इतना दुखी था कि चाह कर भी कुछ ना बोल सका। सिर्फ गुरुजी को देखता ही रहा। लगातार देखते-देखते ही उसके शरीर में कुछ बदलाव आने लगे, पर कह नहीं पा रहा था। गुरु जी ने उसके झोपड़ी में जम कर बैठ गया और उस कोढ़ी के शारीर को देखने लगा ,कोढ़ी हैरान तो था ही और गुरु जी को ऐसे करते देख आश्चर्य में पड़ गए और उसके आँख भर आया !
गुरुजी ने कहा-'और भाई ठीक हो, यहाँ गाँव के बाहर झोपड़ी क्यों बनाई है?'कोड़ी ने कहा-'मैं बहुत बदकिस्मत हूँ, मुझे कुष्ठ रोग हो गया है, मुझसे कोई बात नहीं करता यहाँ तक कि मेरे घर वालो ने भी मुझे घर से निकाल दिया है। मैं नीच हूँ इसलिए कोई मेरे पास नहीं आता।'
उसकी बात सुन कर गुरुजी ने कहा-'नीच तो वो लोग है जिन्होंने तुम जैसे रोगी पर दया नहीं की और अकेला छोड़ दिया।'आ मेरे पास मैं भी तो देखूँ... कहाँ है तुझे कोढ़? जैसे ही गुरुजी ने ये वचन कहे कोढ़ी गुरुजी के नजदीक आया तो सतपुरुष पिता की ऐसी कृपा हुई कि कोढ़ी बिलकुल ठीक हो गया।
यह देख वह गुरुजी के चरणों में गिर गया। गुरुजी ने उसे उठाया और गले से लगा के कहा-'सतपुरुष पिता सतनाम का स्मरण करो और लोगों की सेवा करो यही मनुष्य के जीवन का मुख्य कार्य है।'  
लेखक श्री मंगल चातुरे 


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मानव जीवन का वास्तविक सिद्धांत क्या है ? "मनखे-मनखे एक समान" से परिचित हुए बिना कोई भी मानव पूर्णतः मानव नही हो सकता।...