जातिवाद खत्म करने के उपाय

जातिवाद खत्म करने के उपाय 

जातिवाद तभी खत्म होगी जब जाति को समाप्त कर दिया जाएगा परन्तु ऐसा होने में हजारों वर्ष बीत जाएंगे। इसलिए मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि छग राज्य का अनुकरण हो - इस संबंध में मै सतनामी जाति और उसके संबंध में कुछ लिखना चाहूंगा, आप सबको यह ज्ञात है कि औरंगजेब की सेना से पराजय (1672) के बाद मुट्ठी भर सतनामी ही नारनौल हरियाणा से छत्तीसगढ़ में बसे होंगे। जब 1756 में परमपूज्यनीय बाबा गुरूघासीदास का अवतरण हुआ और छग में व्याप्त कुप्रथाओं के खिलाफ वे स्वयं व उनके सुपुत्रों द्वारा अभियान चलाया गया उसके प्रताप से प्रभावित होकर छग के विशेषतः तेली व राउत सहित अन्य सभी जातियों के लोग सतनामी समाज में स्वयं को मिला लिया। अब मै आपको उस समय की सबसे खास बात तो संभव है आपको लिखित में न भी मिले छग सहित कई राज्यों में डोला उठाने की प्रथा चलती थी इस बात से आप सभी अवगत भी होगें के विरोध में सतनामी सतनामी समाज द्वारा अभियान चलाकर सबसे पहले अपने समाज के डोला उठने पर प्रतिबंध के लिए ही राजागुरू बालकदास द्वारा अखडा प्रथा को प्रारंभ किया गया जिसके कारण ही आज भी सतनामी समाज के विवाह में अखाडा होता है। तत्कालिन परिस्थिति के अनुसार विवाह के दौरान लठिया लोग विवाह में शक्ति प्रदर्शन करते थे और रात्रि में विवाहित वधु के सम्मान की रक्षा करते थे। इसके लिए डोला उठाने वाले प्रभावशाली लोगों के साथ लडाईयां होती थी जो लडाई 1 से 3 दिन तक लगातार चलता था। यदि इस संबंध में आपको पुष्टि चाहिए तो आप ग्राम बांधा, थाना लोरमी जिला मुंगेली के अंजोरदास गौटिया जो वर्तमान में जीवित है से अधिक जानकारी हासिल कर सकते है। डोली उठाने पर प्रतिबंध को लेकर ही छग में सतनामी समाज को छोडकर अन्य सभी जातियां जिसमें हिन्दू धर्म के अनुसार सवर्ण से शुद्र सभी एकजूट होकर लडाई लडते थे। मै आपको XXXXX  जिसके नाम पर RRRRR में प्रसिद्ध कृषि स्कूल चलता है के बारे में भी बता दूं जब ये महोदय जीवित थे तो डोला उठवाया करते थे उन्होने अपने पाल्य व नौकर के विवाह पर जो उन्हे पिता तूल्य मानते थे कि पत्नि को नही छोडने की बात कही तो उसके ही पत्नि के सहमति पर उस नौकर के द्वारा XXXXX का हत्या किया गया। संभवतः XXXXX का हत्या होना ही छग में डोला उठने के परम्परा का अंत हो। 


अब मै आपको आगे बताता हूं जो आपको भी अवगत है वैसे सतनामी समाज गुरूबाबा के संदेशों के अनुरूप वर्ण व्यवस्था और उंच नीच को नही मानता फिर भी अब हिन्दू धर्म से जातिवाद समाप्त करने की बात आती है तो आपके संतुष्टि के लिए कहता हूं मैने पहले भी बताया है कि छग के सभी समाज के लोग सतनामी समाज एवं सतनाम धर्म को आत्मार्पित किये है जिसके कारण ही संभवतः सतनामी जाति का गोत्र राज्य लगभग सभी जातियों से मिलती है इसका ही सहारा लेकर कल्प सवर्णों द्वारा XXXXX इत्यादि समाज को सतनामी शब्द से संबोधन करना प्रारंभ किय जाकर सतनामी समाज को तिरस्कृत जातियों की श्रेणी में रखना प्रचारित किया गया। चूंकि सतनामी जाति हिन्दू धर्म के ब्राम्हणों से भी उत्तम स्तर के खान पान व रहन सहन अपना चुके थे जिससे ब्राम्हण जाति के वर्चस्व को पीडा होने लगा था और कुटिलतापूर्णक धर्म व आस्था के नाम पर समस्त वर्ण के लोगों को भडका कर शुद्र के अछूत श्रेणी में शामिल होना प्रचारित किया गया। परिणामतः अंग्रेजी शासनकाल में सतनामी समाज को अंग्रजी हुकूमत से सतनामी को सतनामी कहा जाय का आदेश प्रसारित करने पर मजबुर कर दिया गया। आप सबको स्मरण है कि सतनामी समाज में मांस मदिरा व रक्तवर्ण के शब्जीयों सहित अनेक प्रकार के कन्द जैसे प्याज लहसुन व मसाले का ग्रहण करना भी प्रतिबंधित है जिस समाज में समस्त प्रकार के जीव हत्या व बलीप्रथा को पाप माना जाता है को सडयंत्रपूर्णक कच्चे मांस काटने वाले जाति के नाम के समतूल्य लाकर उसके जाति का मुहर लगाकर थोपने का प्रयास किया गया। 

आज ठीक यही नीति सवर्णों के लिए अपनाया जाना चाहिए, इस संबंध में छोटा सा नियम प्रस्तुत करता हूं जबतक आरक्षण व जातिगत भेदभाव समाप्त नही हो जाते तब तक आरक्षित वर्ग के लोगों में से ऐसे परिवार जो आर्थिक/शैक्षणिक रूप से सम्पन्न हों को आरक्षण का त्याग करना चाहिए और अपने नव जन्मे बच्चे के नामकरण करते हुए उसके जन्मप्रमाण पत्र व शैक्षिक दस्तावेजों में जाति के स्थान पर ब्राम्हण/राजपूत/बनिया व गोत्र/सरनेम के स्थान पर तद्नुसार ही गोत्र/सरनेम लिखना चाहिए। इससे आपके बच्चे के साथ जातिगत भेदभाव नही होगा, यही जातिवाद खत्म करने का उपयुक्त योजना हो सकता है।


श्री श्री 1008 श्री आचार्य हुलेश्वर जोशी,
महाधर्माधिकारी, सर्वधर्म