सतनाम धर्म का पुनर्स्थापना - Satnam Dharm (सतनाम धर्म)

मंगलवार, 2 जून 2015

सतनाम धर्म का पुनर्स्थापना



सतनामी हिन्दुओ की विभिन्न जातियों में से धर्मान्तरित नये पंथ/धर्म हैं। छग मे इनके प्रवर्तक गुरु घासीदास हैं। उन्होंने 1790 से 1850 करीब 60 साल तक जन मानस में देशाटन करते प्रचार प्रसार किये। कृषि पेशा हैं सात्विक खान पान आचरण गत शुद्धता और कड़ी मेहनत के चलते यह समुदाय तेज़ी से विकास किये इनके बढ़ते प्रभाव को रोकने 1860 में राजा गुरु बालक दास की हत्या के बाद इस समुदाय को नेस्तनाबूद करने (हिन्दू द्वेष भाव वे हिंदुत्व के खुलेआम अवहेलना करते थे।और अंग्रेज वे चाहते थे ये इसाई हो जाय।)दोनों मिलकर सतनामियो के ऊपर अनेक जुल्म किये जमींदारी /गौटीयाई छीने। गावो से बेदखल करवाए और अछूत घोषित करते चमार की उपजाति बना दिए गये। यह अजीब विडम्बना हैं कि एक जाति विहीन पंथ को जो हिन्दू धर्म के विकल्प में उनके समानांतर गठित हुवे उसे एक जाति की उप जाति बना दी गई !आज सतनामी लगभग 50 लाख की संख्या में छग सहित कई प्रान्तों में निवास रत हैं और सतनाम धर्म की संवैधनिक मान्यता के लिए प्रयासरत हैं। हलाकि 1926 में इसे स्वतंत्र जाति की मान्यता दी गई ।यदि सतनाम धर्म को मन्यता मिल गई तो समझिये यह दुनिया की प्रथम जाति विहीन वर्ग विहीन धर्म होगा।जो अंध विस्वास कर्मकांड पुरोहिती और तथाकथित ईश्वर और उनकी अलौकिकता से रहित या मुक्त होंगे।

लेख डॉ अनिल भतपहरी 

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हम भारत के नागरिकों के लिए भारत का संविधान समस्त विश्व के सारे धार्मिक पुस्तकों से अधिक पूज्यनीय और नित्य पठनीय है। यह हमारे लिए किसी भी ईश्वर से अधिक शक्ति देने वाला धर्मग्रंथ है - हुलेश्वर जोशी

निःशूल्क वेबसाईड - सतनामी एवं सतनाम धर्म का कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं का वेबसाईड तैयार करवाना चाहता हो तो उसका वेबसाईड निःशूल्क तैयार किया जाएगा।

एतद्द्वारा सतनामी समाज के लोगों से अनुरोध है कि किसी भी व्यक्ति अथवा संगठन के झांसे में आकर धर्म परिवर्तन न करें, समनामी एवं सतनाम धर्म के लोगों के सर्वांगीण विकास के लिए सतनामी समाज का प्रत्येक सदस्य हमारे लिए अमूल्य हैं।

एतद्द्वारा सतनामी समाज से अपील है कि वे सतनाम धर्म की संवैधानिक मान्यता एवं अनुसूचित जाति के पैरा-14 से अलग कर सतनामी, सूर्यवंशी एवं रामनामी को अलग सिरियल नंबर में रखने हेतु शासन स्तर पर पत्राचार करें।