सतनाम धर्म की श्रेष्ठता

सतनाम धर्म की श्रेष्ठता



सतनाम धर्म के अनुयायी केवल परमपूज्यनीय गुरूघासीदास बाबा, उनके सुपूत्रों और वंशजों द्वारा बताये गये सदमार्ग और बनाये नियमों का ही पालन करते हैं l सतनाम धर्म को जानने के लिए मै छोटा सा परिभाषा प्रस्तुत करता हूं :- “सतनाम धर्म का अनुयायी वह है, जिसके आचरण में सत्य, अहिंसा, परोपकार, शिक्षा, प्रेम, मार्गदर्शन, दया और क्षमा का समावेश हो, जो समग्र ब्रम्हाण्ड के जीवधारियों के लिए उक्त भाव रखता है, आचरण करता है तथा मूलत: मानव-मानव एक समाज का सिद्धान्त व परमपुज्यनीय गुरूघासीदास बाबा द्वारा बताये मार्ग में चलता हो और नियमों का पालन करता है l”






सतनामी वह है जो :-
· सतनाम धर्म के सिद्धान्त जिसे परमपूज्यनीय गुरूघासीदास बाबा, उनके सुपूत्रों और वंशजों द्वारा बनाये गये है मानता हो अर्थात स्वयं को सतनाम धर्म का अनुयायी मानता, स्वीकारता और गर्व से घोषित करता है l
· परमपुज्यनीय गुरूघासीदास बाबा का स्थान जिनके अंतरात्मा में सबसे उपर हो l
· सतनाम सिद्धान्तों का ईमानदारीपूर्णक पालन करता हो l
· जो कण्ठी, जनेउ धारण करता हो, गुरूगददी, जैतखाम और चौकापुजन करता/कराता हो धार्मिक अनुष्ठान के दौरान सफेद धोती कुर्ता पहनता हो l
· मानव-मानव एक समाज के सिद्धान्तों का पालन करता हो l
· परस्त्री को माता एवं बहन के समान मानता हो और धर्मपत्नि के अलावा किसी अन्य स्त्री से भोग की कामना नही करता हो अर्थात ब्रम्हचर्य व्रत का पालन करता हो l
· स्वच्छ, शाकाहार भोजनग्रहण करता हो अर्थात मांश एवं मदिरा का सेवन नही करता हो l
· अच्छे एवं स्वच्छ वातावरण में निवास करता हो l
· गुरूकुल और विद्वानों का सदैव सम्मान करता हो l
· किसी भी स्थिति में सत्य की पराजय स्वीकार नही करता हो और सत्य को छिपाता न हो सत्य की प्रभुता को बनाये रखने के लिए सदैव अपने प्राणों की आहूति देने के लिए सबसे आगे हो l
· समस्त धर्मों का सम्मान करते हुए सतनाम धर्म का प्रचार-प्रसार करता हो तथा धर्म एवं समाजसेवा के लिए सदैव तत्पर रहता हो l
· असत्य, शोषण और अधर्म को स्वीकार नही करता हो, ऐसा करने वाले के विरूद्ध सदैव शक्तिपूर्वक कार्य करता हो l
· जो पितरों का सदैव सम्मान करता हो उनके प्रति आस्था रखता हो तथा संयुक्त परिवार में रहना पसंद करता हो l
· जो किसी अन्य का दासता किसी भी स्थिति में स्वीकार नही करता हो l
· जो जीवन यापन के लिए सम्मानीय पदों पर आसीन रहता हो/ रहने के तत्पर हो अथवा उसी ध्येय का रोजगार करता हो और पद/प्रतिष्ठा और धन कमाने की होड में भी अपने सम्मान सदैव सुरक्षित रखता हो, जिनका मान सदा ही रहता हो l
· जो हिन्दू धर्म के केवल उत्तम उपदेशों को स्वीकार करता हो परन्तु बलीप्रथा, जीव हत्या, पशू शिकार, बहुस्त्री प्रथा, दासता, छुआ-छूत, मदिरापान, जूआ जैसे हीन और नीच कर्मो का खण्डन करता हो अनुकरण न करता हो l
· जो सतनामी जाति को हिन्दू धर्म के अन्तर्गत नही आता है इस तथ्य को भली-भांति अपने पूर्वजो से जानता, मानता और स्वीकरता है l


सतनाम धर्म के संदर्भ में उपरोक्त जानकारी पूर्णत: संक्षिप्त रूप में बताये गये है, जिसके अध्ययन मात्र से ही सर्वश्रेष्ठ धर्म होने का प्रमाण स्वयं के अतरात्मा में स्वप्रकाशित हो जाती है l तब तो अवश्य ही ऐसा धर्म उत्तम धर्मों में है l
सतनाम धर्म के संबंध में महान राजनितिज्ञ और समाजसेवक बाबा भीमराव अम्बेडकर ने मरणासन्न अवस्था में जब वे बौद्ध धर्म स्वीकार कर रहे थे कहा : सतनाम धर्म सारे ब्रम्हाण्ड में सर्वश्रेष्ठ धर्म है, जिसे सारे ब्रम्हाण्ड के समस्त जीवधारी को प्रत्येक जीवन के प्रारंभ और अंत में स्वीकारना ही पडता है l उनके कथनानुसार सतनाम धर्म उत्तम धर्म है l परन्तु उनके द्वारा सतनामधर्म ग्रहण नही करने के संबंध में भ्रांति है कि यदि सतनाम धर्म सर्वोत्तम धर्म है तो वे स्वयं ही जीवन काल के दौरान क्यो नही ग्रहण नही किये इस संबंध में उन्होने कहा है कि मै मरणासन्न अवस्था में सतनाम धर्म को अवश्य ही प्राप्त करने वाला हूं इसलिए मै अपने समाज के बन्धुओ जिसे हिन्दू धर्म के अंतर्गत नीच अर्थात क्षुद्र कहा जाता है, माना और स्वीकार किया जाता है के लिए शुद्रता से मुक्ति के दो अलग-अलग मार्ग खोल रहा हूं जो भविष्य में प्रभावकारी और क्षुद्रता से मुक्ति के दो मार्ग होंगे पहला मार्ग विशिष्ट जनों के लिए होगा जो सतनाम धर्म के सिद्धान्तों का पालन कर सकेंगे सतनाम धर्म अपना लेंगे और दुसरा मार्ग होगा बौद्ध धर्म जो शांतिपूर्ण तरीके से मिल जायेगा जबकि तीसरा मार्ग है शक्तिपूर्ण क्षुद्रता का त्याग अर्थात उच्च कहने, स्वीकारने और मानने वालों से विभिन्न स्तरों पर श्रेष्ठ कर्म और संघर्ष के माध्यम से स्वयं को श्रेष्ठ घोषित करना l
हम सतनाम धर्म और सतनामी के उपरोक्त संक्षिप्त परिचय के अध्ययन उपरांत यह पाते है कि सतनाम धर्म ब्रम्हाण्ड के समस्त धर्मों के केवल मूल और उच्च विचारों से ओत-प्रोत है l सतनाम धर्म के संस्थापक परमपुज्यनीय गुरूघासीदास बाबा जी जो स्वयं साक्षात परमब्रम्ह सतनाम पुरूषपिता है, जो समग्र आत्माओं के कारक अर्थात परमात्मा है, मानव स्वरूप में सर्वस्व से अर्थात ईश्वर से भी उच्च पद को धारण करते हुए गुरू के रूप मे अवतरित हुए और कलयुग में समस्त धर्मों के सिद्धान्तों में कलयुगी आचरणों को समाप्त करने के ध्येय से कि धरती लोक में पुन: सतयुग का स्थापना हो इस परम उददेश्य से सतनाम धर्म का स्थापना किये l
अतएव आप सभी भाईयों, बहनों और माताओं से निवेदन है कि आप सभी ऐसे महान सतनाम धर्म का पालन सुनिश्चित करने के लिए स्वयं को संकल्पित कर लो और परमपुज्यनीय गुरूघासीदास बाबा के द्वारा सतयुग के आरंभ करने के ध्येय को पूरा करने में अपना जीवन लगा दो इससे आपमें महानता आएगी और आपके जीवन से दुख और क्लेश का अंत हो जाएगा और आप धरती को स्वर्ग बना सकोगे आप स्वर्ग जिसकी केवल आपने कल्पना की होगी ऐसे धरती में निवास का अवसर प्राप्त कर सकोगे l


लेखक - हुलेश्वर जोशी सतनामी