मंगलवार, 11 नवंबर 2014

अभिमान से पुण्य को नष्ट कर देती है

अभिमान से पुण्य समाप्त हो जाता है

मनुष्य जन्म के बाद से आनंद की तलाश में भटकता रहता है लेकिन जीवन से संतुष्ट नहीं हो पाता। उसे जीवन तो मिलता है लेकिन जीवन जीने का ढंग नहीं सिखाया जाता। जीवन जीने की रीति और ढंग सिखाने के लिए गुरु ही परमात्मा के प्रतिनिधि होते हैं। गुरु ही हमें जीवन दर्शन देते हैं जिसके माध्यम से हम अपनी क्षमताओं को निखारते हैं।
हमें नकारात्मक विचारों से बचना चाहिए और लगातार जीवन को अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने की कोशिशें करते रहना चाहिए। हर इंसान को जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि विकसित करनी होगी। आम आदमी के लिए गुरु उस मधुमक्खी की तरह काम करते हैं जो जीवन में पुष्पों का मधुर रस लेकर शहद बनाते हैं और हम तक पहुंचाते हैं।
अन्य देशों की अपेक्षा हमारी संस्कृति बहुत मायने रखती है। हमारी संस्कृति में माता-पिता की सेवा भाव का महत्व बताया गया है लेकिन विदेशों की संस्कृति में यह नहीं होता।
भारत में शांति के लिए सिर्फ दो प्रतिशत लोग नींद की गोली खाकर सोते हैं लेकिन विदेशों में 60 प्रतिशत लोग नींद आने के लिए दवाई का इस्तेमाल कर रहे हैं।
हमें अपने संस्कारों पर हमेशा कायम रहते हुए अपनी संस्कृति को बचाने का प्रयास करना चाहिए। गुरु अपने विचारों और उपदेशों से सामाजिक और आध्यात्मिक क्रांति करते है। गुरु महाराज के वचनों और संदेशों की पवित्र गंगा में डूबकर मनुष्य का अंतःकरण शुचिता के आलोक से भर जाता है।
अपनी बोधगम्य सरल और लालित्य पूर्ण शैली में जब गुरु कथा वाचन करते है तो ऐसा लगता है जैसे परमात्मा से सीधे साक्षात्कार हो रहा हो। सत्संग के आयोजन से समाज और युवा पीढ़ी को सन्मार्ग पर चलने का संदेश मिलता है।
अभिमान से पुण्य का फल समाप्त हो जाता है और संतों के दर्शन करने से जीवन धन्य हो जाता है। गुरु जीवन में हमेशा अच्छा करने की प्रेरणा देते है।

लेखक श्री मंगल चातुर 

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